HomeArchivesअंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस — मानसिक पराधीनता का उदाहरण

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस — मानसिक पराधीनता का उदाहरण

जब महिला दिवस की बात हो तो उसमें वैदिक काल से लेकर अब तक हिन्दू स्त्रियों की उन उपलब्धियों पर बात हो, जिन पर बात करने से औपनिवेशिक गुलामी की मानसिकता बदलती है

आज के दिन भारत अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस महिला दिवस का आयोजन किया जाता है। कहा जाता है कि कम से कम वर्ष का एक दिन तो महिलाओं के नाम रहे। महिलाओं की उपलब्धियों का गुणगान होता है। कितनी महान हैं, कितनी दया, करुणा आदि है, इस पर चर्चाएँ होती हैं। परन्तु यह भारत की हिन्दू चेतना के लिए कितना आवश्यक है, या क्यों आवश्यक है, इस पर बात नहीं होती? क्या वास्तव में यह दिवस कुछ नया प्रदान करता है या फिर वह एक और औपनिवेशिक बेड़ी विमर्श के गले में डाल देता है?

इस बात पर अत्यंत अनुसन्धान एवं विमर्श की आवश्यकता है कि क्यों एक ऐसे देश में जहाँ पर सृष्टि के आरम्भ से ही अर्धनारीश्वर की परिकल्पना है, जिसमें स्त्री और पुरुष प्रतिस्पर्धात्मक रूप से समान न होकर परस्पर एक दूसरे को सम्पूर्ण करते हुए संपूरक हैं, उस देश में महिला अधिकारों को तब से देखा जाए, जब वह महिला अधिकारों एवं सम्मान की एक लम्बी यात्रा करके आ चुका है? यह दिवस क्यों मनाया जाता है, इसका इतिहास क्या है? इसका वास्तव में उद्देश्य क्या है, यह सब वास्तव में कितने लोगों को ज्ञात है।

क्यों मनाया जाता है अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

यह कहा गया कि कथित रूप से महिलाओं को पुरुषों के समान वेतन आदि की मांग को लेकर और खराब कामकाजी स्थिति को लेकर आन्दोलन किया गया था, और उसके परिणामस्वरूप वर्ष 1909 में 28 फरवरी को अमेरिका में पहला राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया था, जिसमें अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने 1908 में उन कपड़ों के कारखाने में काम करने वाली महिला श्रमिकों की हड़ताल के पक्ष में समर्थन व्यक्त किया था। महिला श्रमिकों ने कठिन कामकाजी स्थितियों के विरोध में आन्दोलन किया था।

और फिर वर्ष 1917 में रूस की महिलाओं ने “ब्रेड एंड पीस अर्थात रोटी और शांति” नारे के अंतर्गत हड़ताल की और प्रदर्शन किया और उन्होंने यह फरवरी के अंतिम रविवार को किया, जो ग्रेगोरियन कैलेण्डर में 8 मार्च को पड़ा था। इसके बाद रूस में महिलाओं के अधिकारों के सम्बन्ध में बातें होनी आरम्भ हुई।

जब यह पश्चिम में हो रहा था, उस समय भारत पर अंग्रेजों का राज था और अंग्रेजों की आर्थिक नीति से पूरा भारत त्राहि माम कर रहा था। बाद में वर्ष 1977 में जनरल असेम्बली ने यह संकल्प पारित किया कि सदस्य राज्यों द्वारा वर्ष में एक दिन महिलाओं के अधिकारों और अंतर्राष्ट्रीय शान्ति के लिए एक दिन समर्पित किया जाएगा तथा तभी 8 मार्च को महिलाओं के अधिकारों एवं विश्व शान्ति के लिए 8 मार्च को औपचारिक रूप से महिला दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार

“अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण प्राप्त करने की दिशा में हुई प्रगति का जश्न मनाने का अवसर है,  बल्कि साथ ही यह उन उपलब्धियों पर प्रकाश डालने का अवसर है तथा साथ ही दिन है कि जब दुनिया भर में लैंगिक समानता की दिशा में और अधिक गति लाई जाए।“

परन्तु फिर से प्रश्न यही आता है कि इसमें भारतीय परिदृश्य क्या है? इसमें हिन्दू दृष्टिकोण कहाँ है?

कहा जाता है जो स्थानीय होता है, वही अंतर्राष्ट्रीय हो सकता है, पराई भूमि पर उपजा विमर्श देशज विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाता है। यही कुछ इस आयातित महिला दिवस के साथ हो रहा है। जब वह लैंगिक समानता की बात करता है, तो यह किस परिदृश्य में करता है, यह बहुत महत्वपूर्ण है। जब पश्चिम में यह कथित आन्दोलन चल रहे थे तब भारत में स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन चल रहा था और उस समय तक भारत में जो अंग्रेजों से स्वतंत्रता के आन्दोलन हो रहे थे, उनमे स्त्रियाँ बढ़ चढ़ कर भाग ले रही थीं।

वर्ष 1857 का जो स्वतंत्रता संग्राम हुआ था, उसमें रानियों से लेकर आम स्त्रियों ने भी अंग्रेजों का सामना किया था, फिर चाहे वह झांसी की रानी लक्ष्मीबाई हो या फिर झलकारी बाई या फिर अवंतिबाई लोधी। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने तो महिलाओं की टुकड़ी ही बनाई थी, फिर लैंगिक समानता का प्रश्न कहाँ से और कैसे उत्पन्न हुआ?

उससे भी पीछे जाते हैं तो पाते हैं कि जीजाबाई हैं, जो शिवाजी को तैयार कर रही हैं, तत्कालीन सबसे शक्तिशाली साम्राज्य से भिड़ने के लिए। वह हिन्द स्वराज का सपना लिए बैठी हैं। जीजाबाई स्वयं नहीं जाती हैं मैदान में, परन्तु जीजाबाई जो साहस और प्रेरणा देकर जाती हैं, उनके सहारे से उनकी बहू ताराबाई ने औरंगजेब को नाको चने चबवा दिए।

क्रूर औरंगजेब ने काशी में जिन मंदिरों को तुडवाया था, वह अहिल्याबाई होलकर ने पुन: बनवाए। उन्हें समृद्ध रूप प्रदान किया। भारत में महिला वैद्य भी थीं, और इस कथित महिला दिवस से पहले से भी थीं।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी नर्स अर्थात चिकित्सा सहायिका का उल्लेख हमें प्राप्त होता है, अर्थात चिकित्सा का क्षेत्र महिलाओं के लिए था। उसके बाद धर्मपाल द्वारा लिखित द ब्यूटीफुल ट्री में भी ऐसी महिलाओं का उल्लेख है, जो सर्जरी किया करती थीं। और यह बात Dr Buchanan के अनुभव से कही गयी है। उसमें लिखा है कि

“Dr Buchanan heard of about 450 of them, but they seemed to be chiefly confined to the Hindoo divisions of the district, and they are held in very low estimation. There is also a class of persons who profess to treat sores, but they are totally illiterate and destitute of science, nor do they perform any operation. They deal chiefly in oils. The only practitioner in surgery was an old woman, who had become reputed for extracting the stone from the bladder, which she performed after the manner of the ancients”

अर्थात Dr Buchanan ने एक ऐसी बूढ़ी महिला को गॉल ब्लेडर की पथरी की सर्जरी करते हुए देखा जो प्राचीन चिकित्सा से सर्जरी कर रही थी और पथरियों को निकाल रही थीं!

अर्थात यह स्पष्ट होता है कि महिलाएं मात्र पढ़ लिख ही नहीं रही थीं, बल्कि सैन्य संचालन, चिकित्सक, आदि सभी भूमिकाओं का निर्वाह कर रही थीं। फिर इन सभी महिलाओं की उपलब्धि को त्यागकर यह स्मरण रखना कि महिलाओं ने वर्ष 1908 में समान वेतन के लिए आन्दोलन किया और फिर महिलाओं को अधिकार मिलेक्या यह सब भारत की उस समृद्ध परम्परा और इतिहास को नकारना नहीं है? क्या यह वही औपनिवेशिक गुलामी नहीं है, जो हम पर बलात थोपी गयी है?

जब वहां पर महिलाएं समान और खराब कार्य स्थितियों के लिए आन्दोलन कर रही थीं, उस समय भारत में ऐसी स्त्रियाँ भी थीं, जो न केवल स्वतंत्रता आन्दोलन में कदमताल कर रही थीं, बल्कि साथ ही यशोदादेवी जैसी महिला वैद्य थीं, जो अपना चिकित्सालय तब चलाती थीं, जब आयुर्वेद को सरकारी स्तर पर न ही कोई सहायता प्रदान की जा रही थी और सरकारी मान्यता एलोपैथी को प्रदान की गयी थी। यह वर्ष 1906 के लगभग की बात है! यशोदादेवी का चिकित्सालय प्रयागराज में था और उन्होंने अपने पिता से विद्या सीखी थी।

परन्तु फिर भी इन विषम परिस्थतियों में यशोदा देवी चिकित्सालय का संचालन कर रही थीं और उन्होंने महिलाओं के लिए देशी औषधियों पर पुस्तकें भी लिखी थीं। फिर भी यशोदा देवी जैसी महिलाओं को चेतना से पूर्णतया गायब कर दिया गया है और चेतना में एजेंडा के अनुसार वह औरतें बैठा दी गयी हैं, जो औपनिवेशिक गुलामी को ही हिन्दू स्त्रियों में प्रक्षेपित कर रही हैं।

जैसे यह अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस, जो एक प्रकार से पश्चिम का यह दावा है कि “हमने ही महिलाओं को अधिकार दिए!”

जबकि चाणक्य ने वस्त्र उद्योग में महिलाओं के लिए बेहतर कामकाजी स्थिति के विषय में क्या लिखा है, वह देखने योग्य है:

वह लिखते हैं कि

उन महिलाओं का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है जो विनम्रता (या अक्षमता?) के कारण अपने घरों से बाहर नहीं निकलती थीं, और इस सूची में सम्मिलित हैं: विधवाएं, विकलांग महिलाएं, अविवाहित लड़कियां और जिनके पति यात्रा पर थे. ऐसी महिलाओं को मुख्य कपड़ा आयुक्त द्वारा अपने दासों के माध्यम से काम के लिए भेजा गया थावे सुबह-सुबह सूत काटने वाले स्थान पर भी आ सकती थीं, जब यातायात कम होता था [2.23.11,12]. जब वे आए, तो अधिकारी केवल वही करने के लिए बाध्य थे जो कच्चे माल को सौंपने, सूत प्राप्त करने और श्रम का भुगतान करने के लिए आवश्यक था; उसे न तो किसी महिला का चेहरा देखना था और न ही काम से असंबंधित किसी भी बातचीत में शामिल होना था [2.23.14].

समय की मांग है कि जब महिला दिवस की बात हो तो उसमें वैदिक काल से लेकर अब तक हिन्दू स्त्रियों की उन उपलब्धियों पर बात हो, जिन पर बात करने से औपनिवेशिक गुलामी की मानसिकता बदलती है। हिन्दुओं पर यह सोच थोपने का औपनिवेशिक गुलामों का प्रयास कि जो स्वतंत्रता दी है वह पश्चिम से आई है, उसका हर क्षण विरोध होना चाहिए!

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