Sunday, 25 February 2024
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मनु से तुलसी तक — सवालों के साये में क्यों सनातन धर्म?

लगातार बाह्य आक्रमण के बीच मनुस्मृति जैसे ग्रंथ न जाने कितनी बार परिवर्तित हुए होंगे और तुलसीदास की रचना में भी तत्कालीन समाज का प्रभाव पड़ा ही होगा, जिसे बुद्धिजीवी या तो जानते नहीं या जानना नहीं चाहते

साल 2023 की शुरुआत के साथ ही भारत ने सामाजिक ताने-बाने पर आघात करने वाली प्रतिगामी राजनीति का ऐसा अप्रत्याशित दृश्य देखा जिसमें वह सब करने की कोशिश की गई जो नब्बे के दशक में पहले की जा चुकी थी, जिसके परिणामस्वरूप एक संक्षिप्त किंतु विघटनकारी सत्ता परिवर्तन हुआ था — ऐसा परिवर्तन जिसमें सामाजिक न्याय से अधिक सामाजिक विद्वेष और अलगाव उत्पन्न हुआ। किंतु उस वक्त भी जल्द ही भारत के लोगों को राजनीति के मंचो पर की जा रही अदाकारी को समझने में अधिक समय नहीं लगा। नब्बे के दशक में ही जल्दी भारत इस प्रतिगामी घटनक्रम को भुला कर विश्व पटल पर आर्थिक शक्ति बनने की प्रत्याशा मे अपनी नवीन भूमिकाओं की तलाश में आगे बढ गया।

भारत में अनेकों समस्याएँ हैं किंतु भारत की मूल प्रवृत्ति प्रगतिशील है। भारत को अवसाद से अधिक आनंद पसंद है। इतिहास साक्षी है कि अवसाद की राजनीति के जाल-जंजाल में भारत लंबे समय तक कभी उलझा-फ़ंसा नहीं।

मनु से तुलसी, सब राजसत्ता के शिकार

आज की संवैधानिक स्थिति यह है कि सनातन हिंदू धर्म में नये वर्ण या जाति बनाने एवं जो पहले से बनी हुई है, उन्हे उपर उठाने या नीचे गिराने का अधिकार धर्म के पास न होकर राज्य सरकारों के पास है। संविधान ने जाति एवं वर्ण व्यवस्था के नियंत्रण एवं नियमितीकरण की सारी शक्तियाँ राज्य सत्ता के हाथों में सौप दी हैं। राज्य के मुख्यमंत्री को मनुस्मृति के मनु से कहीं ज्यादा अधिकार प्रदान किए हैं एवं राज्य सरकारें इस तरह के अधिकारों का प्रयोग समय-समय पर करती भी रहीं हैं।

उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री रहते हुए सन् 2016 में अखिलेश यादव ने 17 जातियों को ओबीसी से अनुसूचित जाति में अवनत कर दिया था। इस तरह उनकी सामाजिक स्थिति ऊपर से नीचे की गई थी। वैसे मुलायम सिंह यादव ने भी सन् 2005 में ऐसा ही क़दम उठाया था। ऐसी स्थिति में जाति व्यवस्था के लिए सनातन हिंदू धर्म पर आरोप लगाने का न कोई औचित्य है और न आधार, फिर भी जाति के नाम पर सनातन हिंदू समाज को बांटने की पूरी कोशिश जाति की राजनीति करने वाले नेता करते रहते हैं। एक दूसरा प्रश्न है कि दोनों ही नेताओ ने तथा इन्ही की तरह अन्य किसी नेता ने मुख्यमंत्री रहते हुए जातियों को उन्नत क्यों नहीं उठाया। अर्थात् अनुसूचित श्रेणी से अन्य पिछड़ा वर्ग या सामान्य वर्ग की श्रेणी में क्यों नहीं उठाया जबकि ऐसा किया जा सकता है।

किंतु यह भी सत्य है कि जैसे आकाशीय पिंड कभी सीधी तो कभी वक्री चाल चला करते हैं, राजनीति के अभिनेता भी अक्सर उसी तरह की चालें चला करते हैं। इस बार तुलसी की रामचरितमानस कें अलग अलग पात्रों द्वारा किसी अलग ही संदर्भ में कहे गए अलग-अलग संवादो को रामचरितमानस का आधारभूत दर्शन बताकर सनसनी फैलाने का उपक्रम हुआ। एक क्षण के लिए माहौल बदला, जिसकी परिणिति रामचरितमानस की प्रतियाँ जलाने की ख़बरों के रूप में हुई, किंतु जल्द ही इस माहौल में सुधार आता हुआ भी नज़र आने लगा।

मनु से तुलसी तक — सवालों के साये में क्यों सनातन धर्म?

(आभ्यंतरीन चित्र 1)
अखिलेश यादव के चहेते समाजवादी पार्टी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य रामचरितमानस की प्रतियाँ जलाने का आह्वान करने के लिए कुख्यात हैं

भृगुप्रोक्त मनु-स्मृति का डायनामिक सामाजिक मॉडल

रामचरितमानस के पहले मनुस्मृति की प्रतियाँ जलाए जाने की ख़बरें अख़बारों में अक्सर पढने को मिलती रहीं हैं, जिसकी शुरुआत 96 वर्ष पहले तब हुई थी जब अंबेडकर द्वारा 25 जुलाई 1927 को महाराष्ट्र के तत्कालीन कोलाबा ज़िले के महाद में सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति की प्रतियाँ जलाये गईं। जिस देश में संवाद एवं संप्रेषण की स्वतंत्रता को संवैधानिक मान्यता दी गई है, उस देश में किताबों को जलाए जाने की असामान्य घटनाएँ सामान्य बनती जा रही है।

जिस मनुस्मृति को जेएनयू के लेफ़्ट लिबरल प्रोफ़ेसर् मनुवाद से जोड़कर दिखाते हैं, जिस पर इतना हंगामा और उपद्रव किया जाता है, वह वास्तव में मनुप्रोक्त न होकर भृगुप्रोक्त है। जिस भृगुप्रोक्त श्लोक का संदर्भ दिया जा रहा है, वह श्लोक मनुस्मृति के बारहवें अध्याय में इस प्रकार से मिलता है। यथा —

इत्येतन् मानवं शास्त्रं भृगुप्रोक्तं पठन् द्विजः॥

मनुस्मृति, 12.126

अर्थात् यह मानवशास्त्र जिसका अध्ययन द्विज करते हैं वह भृगुप्रोक्त है।

मनुस्मृति का बारहवां अध्याय बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि बारहवें अध्याय में ग्रंथ का उपसंहार होता है जिसमें मनुस्मृति का उद्देश्य एवं तत्कालीन परिवेश की जीवन दृष्टि समाहित है। बारहवें अध्याय से मनुस्मृति की मौलिक धारा मिलती है। बारहवें अध्याय में उपरोक्त श्लोक के ठीक पहले आने वाले श्लोक में संपूर्ण मानव समुदाय को अपने आत्मजनों की तरह एक दृष्टि से देखने की शिक्षा दी गई है, सबको एक दृष्टि से देखने का विचार सर्व-समावेशी विचार है।

एवं यः सर्वभूतेषु पश्यत्यात्मानमात्मना॥

मनुस्मृति, 12.125

मनुस्मृति में अन्य सभी विवादित हिस्सों के बावजूद एक और ऐसा श्लोक मिलता है जो मनुस्मृति पर उठने वाले समस्त विवादों का अंत कर सामाजिक वैज्ञानिकों को भारतीय समाज के गठन पर नये सिरे से अध्ययन करने एवं नया विमर्श आरंभ करने का आह्वान करता है।

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्। क्षत्रियाज् जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात् तथैव च॥

मनुस्मृति, 10.65

अर्थात् ब्राह्मण का शूद्र एवं शूद्र का ब्राह्मण में परिवर्तन तथा इसी प्रकार का परिवर्तन क्षत्रिय एवं वैश्यों की संततियों में जानना चाहिए। इस श्लोक द्वारा एक गतिशील आधुनिक सामाजिक व्यवस्था का ढांचा खड़ा होता है, किंतु इस श्लोक पर न शिक्षाविदों की और न ही समाज-सुधारकों की अपेक्षित दृष्टि पड़ सकी, जिसके अभाव में सामाजिक सौहार्द्र बढाने वाला ठोस विमर्श भी तैयार न हो सका।

इसी प्रकार के बहुत से कथन महाभारत में भी प्राप्त होते हैं। उदाहरण के तौर पर यक्ष एवं युधिष्ठिर के संवाद में युधिष्ठिर ने कहा है कि कोई न कुल से, न स्वाध्याय से, न श्रुति के ज्ञान से, अपितु आचरण वृत्ति से ही कोई द्विजत्व को प्राप्त कर सकता है।

शृणु यक्ष कुलं तात न स्वाध्यायो न च श्रुतम्।
कारणं हि द्विजत्वेच वृत्तमेव न संशयः॥

महाभारत, अरण्य पर्व, 3-314-110

ऐसा नहीं है कि उपलब्ध मनुस्मृति में सबकुछ श्रेष्ठ या आदर्श ही है। वस्तुस्थिति यह है कि मनुस्मृति में वैज्ञानिक चिंतन, आदर्श एवं नैतिकता के उच्च मापदंडों के साथ ही उनके अपवाद एवं परस्पर विरुद्ध नियम, सबका मिश्रण मिलता है, जिससे दो बातें सामने आती हैं। पहली यह कि मनुस्मृति का वृहद भाग प्रक्षिप्त है, अर्थात् बाद में जोड़ दिया गया है।

गुरुकुल कांगड़ी विoविo के भूतपूर्व कुलपति सुरेंद्रकुमार की रीसर्च के आधार पर मनुस्मृति में 1,214 श्लोक मौलिक तथा 1,471 श्लोक प्रक्षिप्त हैं, अर्थात् प्रक्षिप्त अंश लगभग 54% है। सुरेंद्रकुमार की रिसर्च को अंतिम रिसर्च नहीं कहा जा सकता है, किंतु प्रश्न यह भी उठता है कि जेएनयू के प्रोफ़ेसर या विद्यार्थी ऐसी अकेडमिक रिसर्च क्यों नहीं करते हैं। जेएनयू विद्रूप होकर कॉमरेड कल्ट का केंद्र हो गया है। यही हाल अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों का है।

वर्णव्यवस्था की उत्पत्ति

भारतीय संस्कृति में प्रारंभ से ही वर्णव्यवस्था नहीं थी। मत्स्य पुराण के अनुसार संस्कृति के नैसर्गिक विकासक्रम के दौरान त्रेता युग में कृषि के साथ वर्णव्यवस्था के रूप में समाज का गठन हुआ। वैदिक ग्रंथो से जो सूचना मिलती है उसके अनुसार एक ही जन-समुदाय से सभी वर्णो का निर्माण किया गया।

ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेत् ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इति।
तस्मात् तत् सर्वमभवत्॥

बृहदारण्यक उपनिषद, 1.4.10

सभ्यता के आरंभ में भारत का सारा जनसमुदाय एक जैसा आत्मवत था। उसी समुदाय से सारे वर्ण निकले हैं। बृहदारण्यक उपनिषद के उपरोक्त कथन की पुष्टि आधुनिक डीएनए स्टडी में हुई है जिसमें चारों वर्णो के डीएनए में समानतायें पाई गई हैं। पूरी रिपोर्ट शोधपत्रिका नेचर के 9 जनवरी 2009 के अंक में प्रकाशित हुई थी।

वैदिक ग्रंथों में वर्ण व्यवस्था द्वारा दायित्यों का वर्गीकरण तो अवश्य किया गया है किंतु वर्णों के मध्य उच्चता या निम्नता के कोई ठोस संदर्भ या प्रमाण प्राप्त नहीं होते हैं। अब तक की गई भयंकर आलोचनाओ के बावजूद कोई भी शोधकर्ता या लेखक कोई ऐसा ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका है जिससे मूल वैदिक वाङमय में उच्चता या निम्नता सिद्ध होती हो।

पश्चिमी चश्मे से भारत को देखने वाले लेफ़्ट-लिबरल्स एवं नफ़रतों की फ़सल बोने वाले समाज वैज्ञानिक यह कभी नहीं समझ पाए कि ऋषियों ने जल संसाधन एवं कृषि उत्पादन में सभी वर्णो को एक समान नियोजित होने एवं परस्पर सहयोग करने की व्यवस्था निर्मित कर ऐसा ताना-बाना बुना जिसने भारतीय समाज को कभी विघटित नहीं होने दिया।

शंबूक वध, राजा नहुष एवं श्रवणकुमार की कथाएँ

लेफ़्ट लिबरल्स रामायण की ऐतिहासिकता को नहीं मानते हैं। वे लोग जिस राम सेतु के अवशेष अभी भी दृष्टव्य हैं, उस राम सेतु के विरुद्ध जंग लड़ते रहे हैं, किंतु इसी रामायण की शंबूक वध की कहानी को ऐतिहासिकता के सांचे में गढ़ कर सामाजिक वैमनस्यता का बीज बोते हैं। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में प्राप्य शंबूक वध का वृतांत उतना ही हृदयविदारक है जितना कि सीता परित्याग। शंबूक प्रकरण द्वारा जिस बात को प्रमुखता से सामने रखे जाने का प्रयास किया जाता है, वह यही है कि रामायण कालखंड में शूद्र वर्ण को तपस्या करने का अधिकार तो था नहीं, साथ ही साथ ऐसा करने पर मृत्यदंड भी दिया जा सकता था, हालांकि इस आरोप को श्रवणकुमार की कहानी, जो कि अयोध्याकांड में पाई जाती है, पूरी तरह से निरस्त कर देती है।

श्रवणकुमार अपने वृद्ध माता-पिता के लिये पानी लाने हेतु सरयू तट पर जाते हैं। पानी भरने की आवाज को पानी पीता हुआ जंगली पशु समझ कर, राजा दसरथ शब्दभेदी बाण चला देते हैं जिससे श्रवणकुमार की मृत्यु हो जाती है। श्रवणकुमार की मृत्यु से संतप्त उसके पिता राजा दशरथ को शाप देते हैं जो कि सच निकलता है। शाप के अनुसार राजा दशरथ की मृत्य राम वनगमन की घटना के बाद हो जाती है। कहानी का इतना भाग आम जनता में काफ़ी प्रचलित है किंतु महत्वपूर्ण हिस्सा इसके बाद आता है। श्रवणकुमार की कथा का दूसरा हिस्सा अधिक महत्वपूर्ण है तथा सामाजिक नैतिकता एवं धार्मिक व आध्यात्मिक अधिकारो की समानता की दृष्टि से क्रांतिकारी है।

वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकांड के अनुसार श्रवणकुमार के पिता वैश्य और माता शूद्र थीं जो कि गृहस्थ आश्रम त्याग कर वानप्रस्थ आश्रम में तपश्चर्या कर रहे थे, अर्थात् उन्हे तपस्या का अधिकार प्राप्त था, जब उन्हे तपस्या का अधिकार था तो शंबूक को भी वही अधिकार प्रप्त रहा होगा। संदेह का कोई स्रोत उपस्थित नहीं होता है। कहानी के दूसरे हिस्से में श्रवणकुमार के पिता राजा दसरथ को उनकी भांति ही राजा दसरथ को पुत्रशोक में मरने का शाप देते हैं, जो कि राजा दसरथ को लग जाता है, तथा धर्मात्मा राजा जिनका पुत्र भगवान राम हैं जो समस्त पापों से मुक्ति प्रदान करते हैं, राजा दसरथ को लगा हुआ शाप कम नहीं होता एवं उनकी मृत्यु राम वनवास के दुखद अवसर पर पुत्रशोक में हो जाती है।

इस तरह उत्तरकांड के शंबूक वध की प्रक्षिप्त कथा के आरोपों का खंडन अयोध्याकांड के श्रवणकुमार की कथा द्वारा बहुत पहले ही हो जाता है।

सबको तपस्या का अधिकार

शंबूक वध की कथा वेदो के विरुद्ध है क्योंकि वेदों में शूद्र वर्ण सहित सबको तपस्या करने का समान अधिकार मिला हुआ है। इतना ही नहीं, शुक्ल यजुर्वेद में तो ऋषियों ने कहा है कि शूद्रवर्ण का जीवन ही तपस्या है एवं जिन जातियों को आज लेफ़्ट-लिबरल्स ने दलित बना दिया है, उन्हे ऋषियों ने सम्मान प्रदान किया है, मंत्रो में उनके कौशल को नमन किया गया है।

ब्रह्म॑णे ब्राह्म॒णं क्ष॒त्राय॑ राज॒न्यं म॒रुद्भ्यो॒ वैश्यं॒ तप॑से॒ शू॒द्रं॥

शुक्ल यजुर्वेद, 30.5

तपस्या के अर्थ पर किसी तरह का भ्रम न उत्पन्न किया जा सके, इसलिए एक दूसरा मंत्र भी प्रस्तुत किया जा रहा है जो बताता है कि ब्रह्मचर्य एवं तपस्या द्वारा राजा राज्य की रक्षा करता है।

ब्र॑ह्म॒चर्ये॑ण॒ तप॑सा॒ राजा॑ रा॒ष्ट्रं वि र॑क्षति॥

शुक्ल यजुर्वेद, 11.5.17

जब जीवन ही तपस्या है तो शंबूक की तपस्या किसी प्रकार धर्म-विरुद्ध आचरण नही मानी जा सकती थी किंतु उत्तरकांड में एक ऐसी कहानी जोड़ दी गई। वस्तुतः इस तरह की गल्प-कथाएँ बाद में तब जोड़ी गई जब भारत बाहरी आक्रमणों का शिकार था और समाज में उथल-पुथल मची हुई थी। बाह्य आक्रमणकारी इंडो ग्रीक, कुषाण एव शकों ने भारत के प्राचीन गौरव को छिन्न-भिन्न कर दिया था, परम्पराएँ नष्ट हो रहीं थी, तब ज्ञान, मूल्य एवं चरित्र जैसे आदर्शों का कोई मूल्य शेष नहीं रह गया था। संभव है कि ऋषि परंपरा से पृथक तत्कालीन संकीर्णता के दौर में पांडुलिपियों की कापी करने वालों ने किसी क्षुद्र लाभ की प्रत्याशा में ऐसे प्रक्षिप्तांश मिलाए होंगे, किंतु तार्किकता एवं वैज्ञानिक प्रविधि का प्रयोग कर इन प्रक्षिप्तांशों को पहचाना जा सकता है, ऐसे कुछ प्रयास हुए भी हैं।

दलित विमर्श का वैदिक स्वरूप

चूंकि चर्चा चल ही रही है तो जिन जातियों को लेफ़्ट-लिबरल्स बुद्धिजीवियों ने इक्कीसवीं सदी की शुरुआत के आस-पास ‘दलित’ बनाकर मीडिया में पेश करना शुरू किया है, उनकी मूल वैदिक पृष्ठभूमि की ओर एक बार दृष्टिपात करना उचित होगा। एक बार पुनः कर्मकांड के वेद शुक्ल यजुर्वेद की ओर दृष्टिपात करना पड़ेगा जहां आज दलित घोषित की गयी जातियों का संदर्भ सुलभ होता है। दलित जातियों — रथकार, कुम्भकार एवं कामगार — के श्रम एवं कौशल को नमन किया गया है। तथा वेद ही अखिल धर्म के मूल हैं।

नम॒स्तक्ष॑भ्यो रथका॒रेभ्य॑श्च वो॒ नमो॒ नमः॒ कुला॑लेभ्यः क॒र्मारेभ्यश्च वो॒ नमो॒ नमो॑॥

शुक्ल यजुर्वेद, 16.27

रामचरितमानस पर नए विवाद

तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना सन् 1576 के मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में विवाह पंचमी के दिन पूर्ण की थी। प्रारंभ में रामचरितमानस को उस समय के हिंदू समुदाय ने अपनी स्वीकृति नहीं दी थी, जिसके संबंध में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं, किंतु सरस अवधी में लिखी गई लय और टेक से सुसज्जित रामचरितमानस में ऐसा पद लालित्य था कि शीघ्र ही रामचरितमानस जनमानस में अनहद नाद की तरह घर कर गई और शीघ्र ही जिस ग्रंथ को पहले समाज ने अपनाया नहीं, उसी ग्रंथ को धर्मग्रंथो जैसी श्रद्धा एवं मान अर्पित किया गया।

रामचरितमानस के सुंदरकांड का पाठ साम गानों जैसा पवित्र एवं सौभाग्यवर्धक माना गया। तुलसी ने वेद, पुराण, दर्शन एवं ऎतिह ग्रंथो का विशद अध्ययन अवश्य किया था किंतु यह भी सत्य है कि उन्होने ने रामचरितमानस की रचना अपनी भक्ति की भावनात्मक तृप्ति के लिए की थी, बालकांड के शुरू में ही तुलसी ने स्पष्ट किया है —

स्वांत: सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा भाषा निबंधमतिमंजुलमातनोति॥

अर्थात् तुलसी ने अपने स्वयं के अंतस को सुख देने वाली भाषा में निबंधित मनमोहक रघुनाथ-गाथा की रचना की है । रामचरितमानस गाथाओ की परंपरा के अनुरूप है जिसमें आगम, निगम एवं कई पुराणों की सामग्री के अलावा अन्य स्रोतो से भी कुछ सामग्री रामचरितमानस हेतु ग्रहण की गई है। उन्होने लिखा भी है कि

रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि

कवि को जैसी स्वतंत्रताएँ होनी चाहिए, उन्होने वो सभी स्वतंत्रताएँ लीं।

स्पष्ट है कि तुलसी ने रामचरितमानस के रूप में अलग से किसी धर्मग्रंथ की रचना नहीं की थी। रामचरितमानस कोई नया धर्मग्रंथ नहीं था।

‘स्वांतः सुखाय’ के उद्देश्य से लिखे गए रामचरितमानस को धार्मिक ग्रंथ मानने के भ्रम की वजह से ही नेता गण इतना अधिक विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हे थोक में वोट मिलने की आशा है, वे उम्मीद रखते हैं कि प्रतिक्रिया स्वरूप एक दूसरा वर्ग उठ खड़ा होगा जिससे विवाद दो वर्गों की लामबंदी में बदल जाएगा। इस तरह के विवादो से बचने का यही उपाय है कि समाज को बौद्धिक रूप से ऐसा तैयार किया जाए कि वह साहित्य एवं धार्मिक ग्रंथो में अंतर करना सीख सके।

विस्मृत ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्’

सनातन परंपरा में केवल ऋषि-प्रणीत वैदिक वाङ्गमय को ही धर्मग्रंथ की मान्यता प्राप्त हुई है। वैदिक वांग्मय में चारों वेद एवं उनके उत्तर ग्रंथ अर्थात् ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद तथा छः वेदांग आते हैं, रामायण एवं महाभारत इतिहास ग्रंथ हैं तथा पुराण प्राचीन राजवंशो एवं सामाजिक गाथाओ का संग्रह है। धार्मिक शिक्षा एवं नीति का अंश प्रायः सभी ग्रंथो में उपलब्ध है तथापि वैदिक वांग्मय से इतर ग्रंथो की धर्मग्रंथ के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। गीता में श्री कृष्ण ने भी एकमात्र वेद शास्त्र को ही प्रमाण माना है। शास्त्र विधान के द्वारा ही धार्मिक एवं अधार्मिक कर्तव्यों का निर्धारण किया जाता है।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि

श्रीमद्भगवद्गीता, 16.24

जैसा कि पहले भी लिखा जा चुका है, चूंकि सनातन हिंदू धर्म को दीर्घ अवधि तक विदेशी आक्रमणों का सामना करना पड़ा, धार्मिक परम्पराएँ छिन्न-भिन्न हो गईं और संस्कृत का ज्ञान भी क्रमशः कम से कमतर होता गया। ऐसे आपत्तिकाल में जिन रचनाओं से जनता को सहारा मिला, उसे ही जनता ने धर्मग्रंथ के रूप में अपना लिया, जैसा कि ऊपर दर्शाया गया है।

संभवतः धर्म सूत्रों एवं स्मृतियों का निर्माण मूल वैदिक ज्ञान के अप्रचलित या लुप्त होने के बाद हुआ क्योंकि स्मृतियाँ ऋषियों की स्मृति मे उनके बनाए गए नियमों का संग्रह हैं। इसी आधार पर स्मृतियो को मान्यता प्राप्त होती है, किंतु बहुत सी स्मृतियों में वेदों के विरुद्ध कथन भी प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिए बौधायन धर्मसूत्र में वेद और कृषि को परस्पर एक दूसरे को नष्ट करने वाला कह दिया गया, बौधायन का श्लोक देखिए —

वेदः कृषिविनाशाय कृषिर्वेदविनाशिनी॥

बौधायन, 1.5.85

अब ऋग्वेद का मंत्र देखते हैं जिसमें कहा गया है कि जुए के पाशों से खेलने में समय नष्ट न कर कृषि करो कृसि में मन लगाओ, धन कमाओ ।

अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व वित्ते॥

ऋग्वेद, 10.34.13

इन तमाम तरह के अंतर्विरोधो को देखते हुए स्मृतियों एवं धर्मसूत्रों को भारतीय सामाजिक व्यवस्था को चोट पहुंचाने वाले एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना न उचित है और न ही तर्कसंगत है क्योंकि ऋषियों द्वारा रचित वैदिक वाङ्गमय से इनकी पुष्टि नहीं होती है।

रामचरितमानस वस्तुतः कवि द्वारा रचित महागाथा या महाकाव्य है जिसमें अलग अलग पात्र हैं। जहां एक ओर आदर्श के रूप में श्रीराम एवं जानकी, हनुमान्, गुरु एवं ऋषिगण तथा श्रीराम की सेना हैं, वहीं आदर्शहीन रावण, रावण के राक्षस, दंभी समुद्र तथा अन्य पात्र भी हैं जिनके लिए एक श्रेष्ठ कवि के रूप में तुलसी ने कथानुसार अवधी भाषा के संवाद निर्मित किए हैं। उन संवादों की तुलना वैदिक मंत्रों से नहीं की जा सकती है और न ही इन पात्रों के संवादो को धार्मिक व्यवस्था माना जा सकता है।

समुद्र द्वारा की गई आत्मग्लानि में आए ‘ताड़न’ शब्द के दो अर्थ प्रचलित है, जिसमें से जो अधिक प्रचलित है वह है ‘नजर या नियंत्रण में रखना’, किंतु कभी-कभी इसके अर्थ में कष्ट देने का भाव भी निकलता है, कुछ इस तरह —

भाई, तु त हमार बहुतै ताड़ना कीन्हन

अतः किसी एक खाश शब्दार्थ पर अधिक बल देकर, विरोधी पक्ष के न मानने वाले लोगों को मनाना आसान नहीं है। वस्तुतः दोनों में से कोई भी एक पक्ष अपने प्रतिद्वंद्वी पक्ष को इस तरह पूर्णतः संतुष्ट करने में बहुत सफ़ल हो पाएगा, ऐसी उम्मीद कम ही है। समाधान इसी बात में है कि कवि की रचना को काव्य के रूप में सम्मान दिया जाए तथा अलग-अलग पात्रों के संवादों को संवाद ही माना जाए, पात्रों के संवादो को धार्मिक शिक्षा या व्यवस्था में परिणित न किया जाए।

Lalit Mishra
Lalit Mishrahttps://swadharma.in/
Indologist from India, member of advisory boards of many universities, currently a visiting fellow of the Vedic Science Centre, Varanasi, empanelled by some newspapers as an expert on history and science

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