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मौनी अमावस्या व्रत का पालन क्यों, कैसे करें

वैसे अमावस्या विवाह, मुंडन, गृहप्रवेश आदि के लिए शुभ नहीं होता, पर पूर्वजों की सद्गति हेतु पूजा, हवन और यहाँ तक कि पिंडदान भी मौनी अमावस्या को किया जाना चाहिए

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किसी हिन्दू अवसर के आते ही सभी मीडिया वाले Google search का लाभ उठाने विषय पर लेख प्रकाशित करते हैं। परसों आने वाली मौनी अमावस्या भी अपवाद नहीं है। परंतु क्या मीडिया के लेखों में दी गई जानकारी शास्त्र-सम्मत होती है? स्वधर्म की स्थापना मूलतः इसीलिए हुई कि सनातन धर्म पर भ्रामक जानकारी से श्रद्धालु बच सकें। इसलिए सर्वप्रथम इस लेख में इस अवसर के महत्त्व पर बात होगी।

माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहते हैं जब योग-आधारित महाव्रत रखा जाता है। इस मास को कार्तिक माह के समान पुण्य मास भी कहा गया है। इस दिन पवित्र संगम में देवताओं का निवास होता है, अतः इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्त्व है।

गंगा के तट पर भक्त जन एक मास तक कुटी बनाकर स्नान व ध्यान करते हैं। जिन्हें गंगा तक समय पर पहुँचने में कठिनाई हो, वे इस व्रत का पालन अपने निकटस्थ नदी के तट पर भी कर सकते हैं। पर सर्वाधिक पुण्य के लिए प्रयागराज के संगम पर इस व्रत का पालन सर्वोत्कृष्ट माना जाता है। इसके अतिरिक्त हरिद्वार, नासिक और उज्जैन के स्थल भी व्रत के लिए उचित हैं।

मौनी अमावस्या की प्रेरणा — पौराणिक उद्धरण

जब सागर मंथन से भगवान् धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए तब देवताओं एवं असुरों में अमृत कलश के लिए लड़ाई छिड़ गई। इससे अमृत की कुछ बूंदें छलक कर प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में जा गिरी। अन्य मीडिया में इस तथ्य के स्रोत नहीं मिलेंगे, परंतु स्वधर्म में हम स्रोत बता रहे हैं।

ऋग्वेद (1:7:7, 2:23:14, 5:30:7, 6:26:3, 7:6:3 व 8.14.13), यजुर्वेद (13:13), ब्रह्मवैवर्त पुराण, हरिवंश पुराण, स्कन्द पुराण, तैत्तिरीय संहिता, कृष्ण यजुर्वेद, भागवत पुराण आदि में उल्लेख है कि स्वर्ग के राजा इंद्र हाथी ऐरावत पर सवार होकर ऋषि दुर्वासा के पास आए, जिन्होंने उन्हें भगवान् शिव द्वारा दी गई एक विशेष माला भेंट की। इंद्र ने माला स्वीकार कर ली और यह प्रमाणित करने के लिए कि वह अहंकारी देवता नहीं हैं, परीक्षण के तौर पर इसे हाथी की सूंड पर रख दिया। हाथी ने यह जानकर कि इंद्र का अपने अहंकार पर कोई नियंत्रण नहीं है, माला को भूमि पर पटक दिया। इससे ऋषि क्रोधित हो गए क्योंकि यह माला श्री (सौभाग्य) का निवास थी और इसे प्रसाद या आशीर्वाद-युक्त भेंट के रूप में माना जाना था। दुर्वासा ने इंद्र और सभी देवताओं को सभी शक्ति, ऊर्जा और भाग्य से वंचित होने का श्राप दिया।

घटना के बाद हुई लड़ाइयों में देवता दैत्यों से हार गए और बली के नेतृत्व में असुरों ने ब्रह्मांड पर नियंत्रण कर लिया। देवताओं ने सर्वोच्च भगवान् विष्णु से सहायता मांगी, जिन्होंने उन्हें असुरों के साथ कूटनैतिक उपाय से व्यवहार करने का परामर्श दिया। देवताओं ने अमरता के अमृत के लिए संयुक्त रूप से समुद्र मंथन करने और इसे उनके बीच साझा करने के लिए असुरों के साथ गठबंधन किया। पर विष्णु ने देवताओं से कहा कि वे अकेले ही उनके लिए अमृत प्राप्त करने की व्यवस्था करेंगे।

दूध के सागर का मंथन एक विस्तृत प्रक्रिया थी। मंदार पर्वत का उपयोग मंथन की छड़ी के रूप में किया गया और शिव की गर्दन पर रहने वाले नागों के राजा वासुकी मंथन हेतु रस्सी बन गए। दैत्यों ने साँप का सिर पकड़ने की मांग की जबकि देवता विष्णु से परामर्श कर वासुकी की पूँछ पकड़ने के लिए सहमत हो गए। परिणामस्वरूप वासुकी द्वारा उत्सर्जित धुएँ से दैत्यों को विष ही प्राप्त हुआ। फिर भी देवताओं और राक्षसों ने बारी-बारी से साँप के शरीर को आगे-पीछे खींचा जिससे पर्वत घूमने लगा। इस प्रकार समुद्र का मंथन हुआ। जब पर्वत को समुद्र पर रखा गया तो वह डूबने लगा। विष्णु कूर्म (कछुए) के रूप में उनके बचाव में आए और पर्वत को अपनी पीठ पर सहारा दिया।

समुद्र मंथन प्रक्रिया से दूध के सागर से कई वस्तुएँ निकलीं। एक घातक विष था जिसे हलाहल के नाम से जाना गया जो कथा के कुछ संस्करणों में राक्षसों और देवताओं के मंथन के समय नागराज के मुँह से निकल गया था। इससे देवता और दैत्य भयभीत हो गए क्योंकि विष इतना प्रचण्ड था कि वह पूरी सृष्टि को नष्ट कर सकता था। तब देवता सुरक्षा के लिए शिव के पास पहुँचे। ब्रह्मांड की रक्षा के लिए शिव ने विष पी लिया और उनकी पत्नी पार्वती ने शिव के भीतर प्रवेश कर रहे सबसे घातक विष को ब्रह्मांड को प्रभावित करने से रोकने के प्रयास में शिव का कंठ पकड़ लिया। परिणामस्वरूप शिव का गला नीला पड़ गया। इस कारण भगवान् शिव को नीलकंठ भी कहा जाता है।

दूसरे छोर से निकले द्रव्यों के अतिरिक्त घर्षण से भगवान् धनवंतरी अमृतकलश लिए प्रकट हुए।

अमृत को लेकर देवों और दैत्यों के बीच फिर झगड़ा हुआ और झड़प में दैत्यों ने अमृतकलश छीन लिया। तब विष्णु ने ब्रह्माण्ड की सबसे सुन्दरी कन्या का रूप धारण किया — मोहिनी रूप — और घटनास्थल पर प्रकट हुए। स्कन्द पुराण के 13वें अध्याय में विष्णु के मोहिनी रूप का उल्लेख इस प्रकार है —

उस सुन्दर रूप को देखकर वे (दैत्य) मोहित हो गये और प्रेम के आवेग से उन्मत्त हो गये। आपसी संघर्ष छोड़कर वे पास आये और बोले —
‘हे धन्य नारी! यह अमृत का घड़ा ले जाओ और हममें बाँट दो। हम कश्यप के पुत्र हैं; हे सुंदर नितंबों वाली स्त्री, हम सभी को इसका (अमृत) पान करवाओ।’
 दैत्यों ने इस प्रकार विनती करते हुए अमृत कलश को उस स्त्री को सौंप दिया जो अनिच्छुक थी। रमणी ने कहा, ‘’मुझ पर कोई विश्वास नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि मैं एक स्वेच्छाचारी महिला हूँ। तुमने अनुचित कार्य किया है। परंतु मैं इसे अपनी इच्छा के अनुसार वितरित करूंगी। फिर भी मूर्ख दैत्यों ने कहा, ‘जैसा चाहो, वैसा करो।’

स्कन्द पुराण, अध्याय 13

इसके पश्चात जब मोहिनी केवल देवों में अमृत बाँटती गई और दैत्यों को वंचित रखा। पर स्वर्भानु नाम के एक दैत्य ने देव का वेश धारण किया और कुछ अमृत पी लिया। अपनी चमकदार प्रकृति के कारण सूर्य और चंद्र ने छद्मवेश का रहस्य खोल दिया। उन्होंने मोहिनी को सूचित किया, जिन्होंने सुदर्शन चक्र से स्वर्भानु का सिर काट दिया। उस दिन से उसके सिर को राहु और शरीर को केतु कहा जाने लगा।

जब अमृत कलश से रिक्त हो गया तो विष्णु ने अपना मूल रूप धारण किया, गरुड़ पर सवार होकर अपने निवास की ओर प्रस्थान किया। यह आभास होते ही कि उन्हें धोखा दिया गया है, दैत्यों ने देवताओं के साथ युद्ध आरंभ कर दिया। अब तक अमृत के सेवन से देवता पुनः उत्साहित हो चुके थे, पिछली हार की ग्लानि से मुक्त।

इंद्र ने बली से, कार्तिकेय ने तारक से, वरुण ने हेति से, यम ने कालानाभ से, बृहस्पति ने शुक्र से, मित्र ने प्रहेति से, विश्वकर्मा ने माया से, वृहस्पति ने जंभ से, शनि ने नरक से, सावित्री ने विलोचन से, चंद्र ने राहु से, वायु ने पुलोमन से और अपराजिता ने नमुचि से युद्ध किया। प्राणियों के समूहों के बीच द्वंद्वों का भी वर्णन है। अश्विनी युगल और वृषपर्वा, सूर्य और बली के सौ पुत्र, ब्रह्मा के पुत्र इल्वल और वातापि, मरुत और निवातकवच, काली शुम्बा और निशुम्बा के साथ, रुद्र और क्रोधावास, वसु और कालेय। अमृत से शक्ति अर्जित कर चुके देवता विजयी हुए और स्वर्ग को पुनः प्राप्त करते हुए दैत्यों को पाताललोक में निर्वासित कर दिया।

कैसे बने कुछ नदियों के तट अधिक पवित्र

परंतु मोहिनी द्वारा हस्तक्षेप से पूर्व देवों और दैत्यों के बीच जो कलश को लेकर हाथापाई हुई थी, उसी कारण अमृत के कुछ छींटे पृथ्वी पर आ गिरे — उन स्थानों में जहाँ कुम्भ मनाया जाता है। अमृत के प्रसंग में हरिवंश पुराण के 43वें अध्याय में ब्रह्मा कहते हैं —

हे देवों, उत्तरी मंडल में और क्षीरसागर के उत्तरी तट पर अमृत नामक एक अति उत्तम स्थान है — ऐसा बुद्धिमान लोग कहते हैं। आप वहाँ जाएँ और संयमित होकर कठिन तपस्या करें। वहाँ आपको ब्रह्म ज्ञान के अत्यंत परिष्कृत व पवित्र शब्द सुनाई देंगे, जैसे वर्षा ऋतु में पानी से भरे बादलों की गुनगुनाहट। वह दिव्य वाणी समस्त पापों का नाश करने वाली तथा शुद्धात्मा देवताओं के देव द्वारा कही गई थी। जब तक आपकी प्रतिज्ञा पूर्ण नहीं होगी तब तक आप उस महान् विश्वव्यापी वाणी को सुनते रहेंगे। हे देवताओं, आप मेरे पास आए हैं और मैं आपको वरदान देने के लिए तैयार हूँ। बताइये, आप क्या वरदान चाहते हैं?

हरिवंश पुराण, अध्याय 43

इस कारण इन नदियों में स्नान करने पर अमृत स्नान का पुण्य प्राप्त होता है।

यह तिथि यदि सोमवार के दिन पड़े तो इसका महत्त्व कई गुणा बढ़ जाता है। यदि सोमवार हो और साथ ही महाकुम्भ लगा हो तो इसका महत्त्व अनन्त गुणा हो जाता है।

शास्त्रों में कहा गया है कि सत्य/कृत युग में जो पुण्य तप से मिलता है, त्रेता में ज्ञान से, द्वापर में हरि भक्ति से व कलियुग में दान से वैसा ही पुण्य प्राप्त होता है, परंतु माघ मास में संगम स्नान हर युग में अनंत पुण्यदायी होगा।

इस तिथि को पवित्र नदियों में स्नान के पश्चात अपने सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, धन, गौ, भूमि तथा स्वर्ण — जो भी आपकी इच्छा हो — दान देना चाहिए। इस दिन तिल दान भी उत्तम है।

चूँकि इस व्रत में व्रती को पूरे दिन मौन व्रत का पालन करना होता, यह योग पर आधारित व्रत कहलाता है। शास्त्रों में वर्णित भी है कि होंठों से ईश्वर का जाप करने से जितना पुण्य मिलता है, उससे कई गुणा अधिक पुण्य मन का मनका फेरकर हरि का नाम लेने से मिलता है।

इस तिथि को संतों की भाँति चुप रहें तो उत्तम है। यदि संभव नहीं हो तो अपने मुख से कोई भी कटु शब्द न निकालें। इस तिथि को भगवान् विष्णु एवं भगवान् शिव दोनों की पूजा का विधान है। शिव और विष्णु ईश्वरीय सत्ता के दो स्वरूप हैं जो भक्तों के कल्याण हेतु दो भिन्न रूप धारण करते हैं। इस बात का उल्लेख स्वयं भगवान् ने किया है।

इस दिन पीपल में अर्घ्य देकर परिक्रमा करें और दीप दान दें। इस दिन जिनके लिए व्रत करना संभव नहीं हो वह मीठा भोजन करें।

मौनी अमावस्या 2024 की तिथि

अमावस्या तिथि आरंभ — 9 फरवरी, 2024 — 08:02 पूर्वाह्न

अमावस्या तिथि समाप्त — 10 फरवरी 2024 — 04:28 पूर्वाह्न

मौनी अमावस्या का महत्त्व

हालांकि अमावस्या को विवाह, सगाई, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे सभी कार्यक्रमों को करने के लिए शुभ नहीं माना जाता है, पूर्वजों की आत्मा की सद्गति हेतु सभी पूजा अनुष्ठान, हवन, पितृ दोष पूजा और यहाँ तक कि पिंडदान भी परसों किया जाना चाहिए।

अनुष्ठान या कर्मकाण्ड

  1. मौनी अमावस्या व्रत हेतु सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करें।
  2. किसी पवित्र स्थान पर जाएं और गंगा में स्नान करें।
  3. पितरों को समर्पित देसी घी का दीया जलाएँ।
  4. इस शुभ दिन पर पितृतर्पण और पितृपूजा करें।
  5. हवन तथा गायत्री जाप करें और भगवद्गीता का पाठ करें।
  6. इस दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाएँ।
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