HomeArchivesहिन्दू कवयित्रियों पर चुप्पी, मुग़ल शहज़ादियों का महिमामंडन

हिन्दू कवयित्रियों पर चुप्पी, मुग़ल शहज़ादियों का महिमामंडन

कहते हैं इतिहास झूठ नहीं बोलता, वह तथ्यों पर आधारित होता है। परन्तु इतिहासकार तो झूठ या अपने दुराग्रहों के आधार पर बात कर सकता है? वह तो काफ़ी कुछ छिपा सकता है? वह कुछ छिपा सकता है, कुछ तथ्यों की अतिरिक्त व्याख्या कर सकता है। जब भी हम मुग़ल शहज़ादियों की छवि बनाते हैं तो एक ऐसी लड़की की तस्वीर हमारी आँखों में बन जाती है जो पंख लेकर कुछ लिख रही है, जो दरबार में किनारे बने झरोखो में बैठी है या जो बादशाहों को सलाह दे रही है। वह हरम में अपनी सल्तनत चला रही है। अब इसके विपरीत आप मध्यकालीन हिन्दू स्त्रियों के विषय में सोचिये। क्या छवि उभर कर आती है? क्या धुंधली सी भी सकारात्मक उभर कर आती है? आप और चेतना पर ज़ोर डालिए और सोचिये कि क्या तस्वीर उभर कर आती है? यही न कि वह पतियों से मार खा रही हैं और पति के मरने पर जौहर या सती हो रही हैं? या फिर और भी कुछ?

नहीं, हमारे मस्तिष्क में कोई भी छवि नहीं उभरती है! दरअस्ल उस समय की स्त्रियों की कोई छवि है ही नहीं हमारे दिमाग़ में क्योंकि वह पुस्तकों में ही नहीं हैं। कुछ हिन्दू स्त्रियों के बारे में जानना आवश्यक है जो लिखा करती थीं और जो चारिणी से लेकर रानियों तक थीं।

हिन्दू स्त्रियाँ जो छोड़ गईं इतिहास के पन्नों पर अमिट छाप

ठकुरानी काकरेची

यह गुजरात में काकरेची प्रदेश के ग्राम दियोधर के ठाकुर वाघेला अगराजी की पुत्री थीं। इनका विवाह मारवाड़ में पश्चिम परगने केशींगर के चौहान राय बल्लू जी के पुत्र नरहरिदास जी से हुआ था। इनके पति की मृत्यु शाहजहाँ के पुत्रों के साथ युद्ध करते हुए हुई थी। इनके ससुर और पति दोनों ही शाहजहाँ के दरबार में थे।

ठकुरानी काकरेची में अद्भत प्रतिभा थी।  यद्यपि उन्होंने बहुत कुछ लिखा है जो लोक में है पर लिपिबद्ध न होने के कारण उपलब्ध नहीं है, तथापि एक दोहा हर स्थान पर उपलब्ध है जिसमें उस व्यक्ति को उन्होंने पहचाना है जो उनके पति की मृत्यु के उपरान्त उनका रूप रखकर आ गया था। वह कदकाठी और रूप में लगभग उनके पति के ही समान था, तो उन्होंने कहा था

धर काली का करघरा, अधकाला अगरेस,

नाहर नेजा नै बजिया, क्यों पल्टाऊँ बेस!

प्रवीण राय

ऐसी ही एक स्त्री थी प्रवीण राय। यह ओरछा की एक नर्तकी का नाम था। वह नर्तकी राजा इन्द्रजीत के लिए और राजा इन्द्रजीत उस नर्तकी के लिए समर्पित थे। ऐसी नर्तकी जिसके रूप की कहानियों पर अकबर मोहित हो गया था और उसने महाराजा इन्द्रजीत के दरबार से प्रवीनराय को बुलवा भेजा। ऐसा नहीं था कि प्रवीनराय को यह नहीं पता था कि अकबर ने उसे क्यों बुलाया है। जब राजा इन्द्रजीत सिंह ने उसे जाने की अनुमति नहीं दी तो अकबर ने उस पर एक करोड़ रूपए का जुर्माना लगा दिया।

प्रवीण राय अकबर के दरबार गयी और फिर अपनी वाक्पटुता और काव्यकला के चलते अकबर को परास्त करके वापस आ गए।

प्रवीणराय ने अकबर के सम्मुख एक दोहा गाया

विनती राय प्रवीन की सुनिए साह सुजान,

जूठी पतरी भखत हैं, बारी बायस स्वान!

प्रवीण राय ने श्रृंगार की कविताएँ भी की हैं, मिलन की कविता में वह लिखती हैं

कूर कुक्कुर कोटि कोठरी किवारी राखों,

चुनि वै चिरेयन को मूँदी राखौ जलियौ,

सारंग में सारंग सुनाई के प्रवीण बीना,

सारंग के सारंग की जीति करौ थलियौ

बैठी पर्यक पे निसंक हये के अंक भरो,

करौंगी अधर पान मैन मत्त मिलियो,

मोहिं मिले इन्द्रजीत धीरज नरिंदरराय,

एहों चंद आज नेकु मंद गति चलियौ!

रामभक्ति एवं निर्गुण काव्य धारा की कवियत्रियाँ

ऐसा कहा जाता है कि स्त्रियाँ राम भक्ति की रचनाएं नहीं रच सकतीं या कहें कि वह राम से दूरी करती हैं। क्या यह सत्य है या मिथक? या ऐसी कवयित्रियों को जानबूझकर उपेक्षित किया गया।

इतिहास के पन्नों में राजस्थान में प्रतापकुंवरी बाई हमें प्राप्त होती है, जिन्होनें रामभक्ति की रचनाएं रचीं। स्त्रियों का सहज आकर्षण कृष्ण के प्रति है, अत: भक्तिकाल में अधिकतर रचनाएँ कृष्ण भक्ति काव्य की ही प्राप्त होती हैं। परन्तु आधुनिक काल में प्रतापकुँवरि इस सीमा से परे जाती हुई नज़र आती हैं। उन्होंने राम पर बहुत लिखा है, कुछ पंक्तियाँ हैं:

अवध पुर घुमड़ी घटा रही छाय,

चलत सुमंद पवन पूर्वी, नभ घनघोर मचाय,

दादुर, मोर, पपीहा, बोलत, दामिनी दमकि दुराय,

भूमि निकुंज, सघन तरुवर में लता रही लिपटाय,

सरजू उमगत लेत हिलोरें, निरखत सिय रघुराय,

कहत प्रतापकुँवरी हरि ऊपर बार बार बलि जाय!

इसके साथ ही उन्हें जगत के मिथ्या होने का भान था एवं उन्होंने होली के साथ इसे कितनी ख़ूबसूरती से लिखा है:

होरिया रंग खेलन आओ,

इला, पिंगला सुखमणि नारी ता संग खेल खिलाओ,

सुरत पिचकारी चलाओ,

कांचो रंग जगत को छांडो साँचो रंग लगाओ,

बारह मूल कबो मन जाओ, काया नगर बसायो!

इसके अतिरिक्त इन्होनें राम पर बहुत पुस्तकों की रचना की है।

ऐसा नहीं है कि हिन्दू स्त्रियों का अस्तित्व मुग़ल काल के दौरान नहीं था! उनका न केवल पृथक अस्तित्व था अपितु वह पर्याप्त शिक्षित थीं। वह पिछड़ी नहीं थीं, जैसा एक अवधारणा के चलते हमें विश्वास दिलाया गया।

अगले लेख में निर्गुण उपासिका स्त्रियों पर बातें! परन्तु यह प्रत्येक हिन्दू को ध्यान में रखना होगा कि हिन्दू स्त्रियों में चेतना सदा से थी एवं वह सदा से ही शिक्षित थीं। एक षड़यंत्र के चलते हिन्दू स्त्रियों को पिछड़ा दिखाया गया और मुग़ल शहज़ादियों को विकसित दिखाया गया, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत थी।

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