कई वरिष्ठ मौलवियों और मुसलमान नेताओं ने शुक्रवार को वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद पर हाल के क़ानूनी और प्रशासनिक विकास पर समुदाय की पीड़ा व्यक्त की। उनके अनुसार न्यायपालिका और नौकरशाही ने उनके साथ “घोर अन्याय” किया, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें अभी भी न्याय और लोकतंत्र में विश्वास है।
दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में व्यक्त किए गए मुसलमानों की शिकायत की गूंज वाराणसी में भी सुनाई दी जहाँ ज़िला अदालत के आदेश पर पूजा के लिए हिंदुओं के लिए तहख़ाना खोले जाने के बाद पहले शुक्रवार को सामान्य संख्या से छह गुना अधिक, 3,000 मुसलमानों ने मस्जिद में नमाज़ अता की।
मस्जिद समिति के सदस्यों ने कहा कि नमाज़ियों की ऐसी तादाद उनके समुदाय में “बढ़ते असंतोष” को दर्शाती हैं जिसके कारण वाराणसी शहर में मुसलमानों ने बंध भी मनाया।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा आयोजित दिल्ली संवाददाता सम्मेलन में जमीयत उलमा-ए-हिंद (JUH) के मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि —
यह तो एक तसव्वुर (अवधारणा) दिया जा रहा है कि जहाँ भी अक्सरियत (बहुसंख्यक) इस मुल्क के अंदर अपने अक़ीदत (विश्वास/आस्था) की बुनियाद के ऊपर किसी मसले को लाएगी, वहाँ हक़ीक़त (वास्तविकता) और सबूत (प्रमाण) ओ शहादत (साक्ष्य) को नहीं देखा जाएगा, बल्कि वहाँ यह देखा जाएगा कि अक़ीदतमंदी क्या चाहती है। जो चाहती है, उसे पेश कर दिया जाएगा। तो मुल्क कैसे चलेगा? … इस फ़ैसले ने बाबरी मस्जिद के जो रास्ता खोला है कि… आज मुसलमान यह कह रहा है कि मसले की बुनियाद लोअर कोर्ट से सूप्रीम कोर्ट तक अक़ीदत के ऊपर है, क़ानून के ऊपर नहीं है।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉं बोर्ड के ख़ालिद सैफ़ुल्लाह रहमानी ने कहा कि —
ये जो बात कही जाती है कि ज्ञानवापी मस्जिद और कई मस्जिदों के बारे में कि मुसलमानों ने किसी दौर में मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई, ये बिलकुल ग़लत है। सबसे पहले तो आपको इस्लामी तसव्वुर (concept) को समझना चाहिए, इस्लाम की सोच को समझना चाहिए क्योंकि इस्लाम में रफ़क़ की हुई (annexed) ज़मीन, दूसरों की छीनी हुई ज़मीन पर मस्जिद बनाने की इजाज़त नहीं है।
यह बात और है कि मुसलमान हमेशा इस्लाम के उसूलों पर नहीं चलते और क़ुरान और अहादीस (‘हदीस’ का बहुवचन) में ही कई जगहों पर परस्पर विरोधी बातें काही गई हैं जिनमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) को ख़त्म करने की बात भी शामिल है। यदि छीनी हुई ज़मीन पर मस्जिद नहीं बन सकती तो कोई और मस्जिद की ब तो छोड़िए, काबा भी नहीं बन पाता। काबे में पहले इस्लाम-पूर्व अरब सभ्यता की मान्यताओं के अनुसार पूजा हुआ करती थी। इसके अलावा मुसलमानों ने 40,000 मंदिर तोड़े, इस बात के सबूत इतिहास में हैं।
वाराणसी ज़िला अदालत द्वारा ज्ञानवापी ढाँचे के तलघर में हिंदू पूजा की अनुमति दिए जाने और इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा शुक्रवार को आदेश पर रोक लगाए जाने से इनकार के बाद मुसलमान नेताओं ने ये बयान दिए।
इससे पहले Archaeological Survey of India (ASI) द्वारा ज्ञानवापी के सर्वेक्षण का आदेश ज़िला अदालत ने एक अन्य याचिका पर कार्यवाही करते हुए दिया था जिसमें कहा गया था कि मस्जिद का निर्माण मूल काशी विश्वनाथ मंदिर के कुछ हिस्सों को ध्वस्त करने के बाद किया गया था।
ASI रिपोर्ट में कहा गया कि परिसर के नीचे हिंदू मूर्तियाँ दबी हुई हैं जो मस्जिद को स्थानांतरित करने की मांग करने वाले हिंदू पक्ष के दावों को बल देता है। मस्जिद के अधिकारियों ने ASI के निष्कर्षों का विरोध किया है।
संवाददाता सम्मेलन में एक संयुक्त बयान जारी किया गया। इसमें पर्सनल लॉ बोर्ड, जेयूएच (मौलवियों की संस्था) के दोनों गुट, मरकज़ी जमीअत अहल ए हदीस हिंद, दिल्ली की फ़तेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुकर्रम अहमद, जमात-ए-इस्लामी हिंद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने मिलकर राष्ट्रपति और भारत के मुख्य न्यायाधीश से यह अपील की कि उनके डर को दूर किया जाए कि न्यायपालिका और नौकरशाही अपने उसूलों के साथ बड़े पैमाने पर “समझौता” कर चुका है।
मुसलमानों के इस अपील में कहा गया कि —
अदालत द्वारा प्रशासन को आवश्यक व्यवस्था करने के लिए सात दिन की मोहलत देने के बावजूद इस कार्रवाई (ज्ञानवापी बेसमेंट में पूजा) की तुरंत शुरुआत, प्रशासन और वादी के बीच स्पष्ट मिलीभगत के बारे में सवाल उठाती है जो किसी भी प्रयास को विफल करने का प्रयास कर रही है। मस्जिद प्रबंधन समिति ज़िला न्यायालय के आदेश के ख़िलाफ़ उपाय करेगी… यह साफ़ करना ज़रूरी है कि इस तहख़ाने में (पहले) कभी कोई पूजा नहीं की गई थी। (अनुवादित)
ख़ैर, ज्ञानवापी संबन्धित हालिया घटनाओं पर मुसलमानों के रहनुमाओं का कहना है कि Places of Worship Act (पूजा स्थल अधिनियम), 1991, पर “सुप्रीम कोर्ट की लगातार चुप्पी देश में मुसलमान समुदाय के लिए गहरी चिंता का विषय बन गई है… हमारा मानना है कि इस बार देश की गरिमा और न्यायिक प्रणाली और प्रशासनिक मामलों की निष्पक्षता से भारी समझौता किया गया है।”
वर्ष 1991 में बने का पूजा स्थल अधिनियम के अनुसार रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल के अलावा 15 अगस्त 1947 के पहले से मौजूद पूजा स्थलों की प्रकृति पर यथास्थिति बनी रहनी चाहिए। परंतु मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि से लगी शाही ईदगाह मस्जिद और ज्ञानवापी को मंदिर बनाने के लिए हिंदुओं को सौंपने की मांग उठाते हुए कई अदालती मुक़द्दमे दायर किए गए हैं।
कुछ मुसलमान बुद्धिजीवियों ने समुदाय को स्वेच्छा से इन स्थानों को हिंदुओं को सौंपने का सुझाव दिया है जिस पर प्रतिक्रिया देते हुए JUH के सचिव नियाज़ फ़ारूक़ी ने कहा कि —
आपने हमें कब मौक़ा दिया है? बाबरी फ़ैसले के बाद शांतिपूर्ण स्वीकृति हुई। फिर भी अब ताक़त का इस्तेमाल किया जा रहा है और लोगों को इन मस्जिदों को छोड़ने के लिए भी मजबूर किया जा रहा है।
वाराणसी में मस्जिद समिति के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि —
हम तहख़ाने से रुक-रुक कर ‘हर हर महादेव’ के नारे सुन रहे हैं और घुटन महसूस कर रहे हैं।
जबकि व्यास परिवार के सदस्यों और काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों ने पूजा की, प्रशासन ने भक्तों के लिए 18 फ़ीट दूर से पूजा देखने के लिए मंदिर की ओर से एक ग्रिल खिड़की स्थापित की। काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद एक ही परिसर साझा करते हैं।



